Archive for May, 2016

Labour’s Day!!!

Posted: May 1, 2016 in Uncategorized

#‎copied‬ मजदूर..। ये वही ‘हम भारत के लोग…’ हैं जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए मई की खड़ी धूप में पसीना बहाते हैं.. दो-ढाई सौ रुपये कमाने के लिये दिन भर अपना खून जलाते हैं। रिक्शा खींचते… भट्ठों पर ईटों को साँचे में ढालते… सीमेंट का बोरिया चार मंजिला ऊपर पहुंचाते… हाँथ में कुदाल लिए जेसीबी मशीन के आगे पीछे अपनी पोजीशन संभालते.. और शाम तक अधमरा हो जाने के बाद ‘साहब’ के सामने अपने हक़ के पैसों के लिए गिड़गिड़ाते इन मजदूरों की सूखी आँखों में कभी गौर से देखा है आपने...? अपनी बीवी के लिए साल में दो साड़ी… बच्चों के लिए दशहरे के मेले में गुड़ की जलेबी और कुछ खिलौने.. बाबू जी की दवा.. बरसात में टपकते घर के खप्पर की मरम्मत.. और रोज शाम ढले एक पाउच अंगूरी दारू..। बस और क्या !! उनकी खुशियाँ बड़ी छोटी-छोटी होती हैं साहब !!
आज तक विकास की कोई भी कहानी इनके हस्ताक्षर के बिना पूरी नहीं हुई। लेकिन हमने इन मजदूरों को क्या दिया? जब से सोशल मीडिया चला है हर चीज ‘हैपी’ हो चली है। क्या करेंगे फिक्रमंद और बुद्धिजीवी दिखने की होड़ लगी है। इधर लॉग इन कर के ‘हैपी मजदूर दिवस’ टाइप हो रहा है और उधर न जाने कितने मजदूर मई की ‘लू’ में डिहाइड्रेशन से ‘हैपी’ हो चुके होंगे.. न जाने कितने रिक्शे वालों को पांच रूपये के लिए थप्पड़ जड़ा जा चुका होगा, न जाने कितने श्रमिकों की उँगलियाँ घायल हुई होंगी.. और न जाने कितनों की पगार ‘साहब’ ने मार ली होगी। पैसे वालों के लिए ये इंसान नहीं सिर्फ ‘एक मौक़ा’ हैं। पाइप लगा कर कैसे इन्हें अधिक से अधिक चूस लें कि कम लागत में अधिक निर्माण करा लें। हमने इन्हें चूस कर जीते जी इतना महत्वहीन कर दिया है कि कोलकाता पुल के नीचे सैकड़ों ज़िंदा दफ़न हो गए और उधर न्यूज चैनल वाले स्वर्गीय प्रत्युषा बनर्जी का ब्रांड वैल्यू रेखांकित करने में मशगूल थे।
आज फिर वही ‘मजदूर दिवस’ है। इससे पहले कि उनका विश्वास दम तोड़ दे, ये एक मौका है उनकी सूखती आँखों पर पानी के छीटें मारने का और थपकी देकर श्रम में उनकी आस्था बढ़ाने का। मुझे पता है कि लेख लिखने से उनकी छोटी खुशियाँ हासिल नहीं हो जाएँगी लेकिन ये एक मौका है उन्हें ‘इंसान’ समझने का। ये सिर्फ दिवस नहीं बल्कि एक मौका है इस दुनिया को बेहतर बनाने का।

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